रात
रात बड़ी है अन्धेरी सी
सुबह सहर ये कब आएगी.
धूऑ उड़ाके चान्द भुझाना
गये दिनो को याद कराना.
ये, मै भि क्या, मैं को
मुझसे
दूर कहाँ तक ले जाएगी
रात बड़ी है अन्धेरी सी
चाह की प्याली कब आएगी
वो सुर्र्रर् के पीना, होड
लगाना
बिसकुट, डुबो .. डुबो
गिराना
चोट लगे तो उफ ना करना
बस, मॉ के पेहलू मे
चिल्लाना
बच्पन की हर याद मुझे क्या
फिर बच्पन मे ले जाएगी.


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