Ashutosh

20.2.13

रात


रात बड़ी है अन्धेरी सी
सुबह सहर ये कब आएगी.
धूऑ उड़ाके चान्द भुझाना
गये दिनो को याद कराना.
ये, मै भि क्या, मैं को मुझसे
दूर कहाँ तक ले जाएगी

रात बड़ी है अन्धेरी सी
चाह की प्याली कब आएगी
वो सुर्र्रर् के पीना, होड लगाना
बिसकुट, डुबो .. डुबो गिराना
चोट लगे तो उफ ना करना
बस, मॉ के पेहलू मे चिल्लाना
बच्पन की हर याद मुझे क्या
फिर बच्पन मे ले जाएगी. 


तू

हर वक़्त तू है, हरदम तूही
रूह मे रोशन तूही
अक्स तू है, दरपन तूही
खेलता बच्पन तू घर मेरा आंगन तूही
गुल्फोश तू है गुल्फाम तूही
अन्धेरी सी सुबह तू है  रौशन सी है शाम तूही
मैं तुझमे तू मुझमे है और मेरा है नाम तूही
बद तू है बरबाद तू है और बद से है बदनाम तूही
मैं बस बकता रहता हूँ और करता है सब काम तूही
चिट्ठी का हर आखर मैं हूँ पर पूर है पैगाम तूही
गर मैं तू है और तू मैं हूँ तो फिर शायद है भगवान तूही


                ________________ Ashutosh